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Showing posts from May, 2018

Aaj Ye Gham Hai

आज ये गम है के कुछ भी नहीं हूँ मैं कल जहाँ पहुँचा था , अब तक वहीं हूँ मैं देखी है ज़माने कि तरक्की तो सच कहूँ अदना सही, मुतासिर कभी, हासिद नही हूँ मैं उनकी नवाज़िशें मुझे अच्छी नही लगती कल तक के जिन दिलों का सहारा रहा हूँ मैं सब अपने इरादों से डुबोई है कश्तियान वैसे किसी भंवर का मारा नही हूँ मैं मेरे पते के खत भी मिलेंगे यक़ीन से ख़ानाबदोश हूँ, मगर बेघर नही हूँ मैं कालिख मे सुर्ख़ियों के ढलने का चलन है अख़बार तो आता है , पढ़ता नही हूँ मैं कैसे बताऊं दोस्त के मेरी रज़ा क्या है मैं आशना हूँ लेकिन मेहरम नही हूँ मैं है हर नज़र मे नज़रिए की मिलावट जैसा तू जानता है,वैसा नही हूँ मैं